इतनी मुद्दत बाद मिले हो
रात गए तक क्यूँ जागे हो?
आज आये तुम किन नये तारों तले, कि घड़ी में रेजिस्तान आ बासा। पढ़ सको तुम किस्से हिज्र के जो, हवा को भी रेत से जुदा रखा। पर रिझाने को खूब हैं ख़त पड़े, मलाल कोई देहलीज़ ना पार कराना। वक़्त नहीं आज पिघला दिल जमाने को, बाहों को फिर ना तुम सुना छोड़ जाना। बालों में कमल की कली जो सजे, खिलने पर उसके, उदास ना हो जाना। आहें भरे, सवेरे की रंजिश जो कहो, दिन में यकीन लो हमसे भी छूटा।


